ग्वालियर । सरकारी अस्पताल में सस्ते इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को जांच के नाम पर जेब ढीली करनी पड़ रही है। डॉक्टर बीमारी पकड़ने के लिए जरूरी जांच लिख रहे हैं, लेकिन अस्पतालों की पैथोलाजी में वे जांचें उपलब्ध नहीं हैं
नतीजा, गरीब मरीजों को सरकारी अस्पताल से निजी लैब की ओर भेजा जा रहा है, जहां जांचों के लिए 1000 से 1500 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। मुरार जिला अस्पताल और हजीरा सिविल अस्पताल की स्थिति बताती है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में जांच की सुविधा का दावा मरीजों के लिए कितना अधूरा साबित हो रहा है।सबसे खराब स्थिति मुरार जिला अस्पताल की है। यहां 130 प्रकार की जांचों में से केवल 80 ही हो पा रही हैं। यानी करीब 50 तरह की जांचों के लिए मरीजों को बाहर जाना पड़ रहा है। इलेक्ट्रोलाइट, सीआरपी, एलएफटी, पीटी-आइएनआर, एचबीएवनसी और आरए फैक्टर सहित अन्य महत्वपूर्ण जांचें उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानी उठानी पड़ रही है।

डॉक्टर द्वारा जांच लिखे जाने के बाद भी अस्पताल में सुविधा नहीं मिलती तो मरीज के सामने निजी लैब में पैसे खर्च करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचता। हजीरा सिविल अस्पताल में भी हालात बेहतर नहीं हैं। यहां 112 तरह की जांचों में से 36 जांचें नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में नाममात्र शुल्क पर इलाज और जांच की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा हैसरकारी अस्पतालों में पैथोलाजी सेवाओं के संचालन की जिम्मेदारी कुछ महीने पहले प्रदेश स्तर पर साइंस हाउस मेडिकल प्राइवेट लिमिटेड को सौंपी गई थी। अनुबंध के तहत कंपनी को अस्पतालों में आधुनिक मशीनें स्थापित कर जांच सेवाएं सुचारू रूप से उपलब्ध करानी थीं। इसके बावजूद जरूरी सामग्री या संसाधन उपलब्ध नहीं होने से कई जांचें नहीं हो पा रही हैं।


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