आरक्षण हटाओ आंदोलन के बैनर तले हो रहे इन प्रदर्शनों से आरक्षण की बहस एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गई है लेकिन बीजेपी के लिए यह सिर्फ़ आरक्षण की नीति पर बहस नहीं है, यह उसके सामने खड़ी एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है एक तरफ जनरल कैटेगरी के उस वर्ग की नाराज़गी है जो लंबे समय से उसके समर्थन का मूल आधार रहा है. दूसरी तरफ अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समुदाय हैं, जिनमें बीजेपी ने पिछले एक दशक में अपना सामाजिक आधार बढ़ाया है |

इनके बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब कुछ ही महीने दूर है. ऐसे में सवाल यह भी है कि बीजेपी आरक्षण को लेकर उठ रही इन नई मांगों का जवाब कैसे देगी, वह भी बिना अपने एक समर्थक समूह को दूसरे से दूर किए हुए
यही बीजेपी की असली राजनीतिक दुविधा है क्या बीजेपी अनारक्षित जातियों की चिंताओं को संबोधित करते हुए ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के बीच अपने समर्थन को बनाए रख पाएगी? या आरक्षण की बहस एक बार फिर उसके लिए वही मुश्किल राजनीतिक संतुलन पैदा करेगी, जिसमें एक समर्थन समूह को आश्वस्त करने की कोशिश दूसरे समूह में असुरक्षा पैदा कर सकती है |


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